आधार और राशन कार्ड पर नागरिकता का ठप्पा नहीं


सुप्रीम कोर्ट का ताज़ा फैसला एक बार फिर यह याद दिलाता है कि आधार कार्ड, राशन कार्ड या ऐसे किसी पहचान पत्र का होना अपने आप में नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं है। यह सिर्फ एक पहचान का माध्यम है, नागरिकता का सबूत नहीं।

यह मामला बिहार के “स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन” (SIR) से जुड़ा है, जिसमें वोटर लिस्ट की जांच के दौरान कुछ जीवित लोगों को मृत बताया गया था। आरजेडी सांसद मनोज झा के वकील कपिल सिब्बल ने कोर्ट में दलील दी कि वोटर सूची में भारी गड़बड़ी है और कुछ लोगों को बिना पर्याप्त सबूत के सूची से बाहर किया जा रहा है। इसी सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि आधार या राशन कार्ड के आधार पर नागरिकता तय नहीं हो सकती।

याचिकाकर्ता योगेंद्र यादव ने तो यहां तक कर दिखाया कि जिनको “मृत” बताकर वोटर लिस्ट से हटाया गया था, उन्हें कोर्ट में जिंदा पेश कर दिया। जज ने इस तर्क को “शानदार” बताया। यह घटना न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करती है, बल्कि चुनावी प्रक्रिया की गंभीरता पर भी सवाल उठाती है।

मुद्दा सिर्फ तकनीकी नहीं, लोकतंत्र की नींव से जुड़ा है। अगर हम नागरिकता की परिभाषा को सिर्फ दस्तावेज़ों पर निर्भर कर देंगे, तो हजारों-लाखों असली नागरिक दस्तावेज़ी खामियों की भेंट चढ़ सकते हैं। वहीं, फर्जी दस्तावेज़ वाले लोग सिस्टम में घुस सकते हैं।

 पत्र जरूरी हैं, लेकिन इन पर ही अंतिम भरोसा करना खतरनाक है। ज़रूरत है एक पारदर्शी, मानवीय और सटीक जांच-प्रक्रिया की, ताकि किसी भी नागरिक का मताधिकार कागज़ी भूल-चूक की वजह से न छीना जाए।

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