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पहलगाम आतंकी हमले में शहीद पर्यटक को दी गई श्रद्धांजलि

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राष्ट्रवादी नौजवान सभा के बैनर तले आयोजित हुआ मौन श्रद्धांजलि कार्यक्रम जौनपुर। जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में शहीद हुए पर्यटक को श्रद्धांजलि देने के लिए राष्ट्रवादी नौजवान सभा के तत्वावधान में एक शोकसभा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में कैंडल मार्च के साथ मौन श्रद्धांजलि दी गई। इस अवसर पर पिंकू सिंह और राष्ट्रवादी नौजवान सभा के अध्यक्ष श्री नवीन सिंह सहित बड़ी संख्या में युवाओं की उपस्थिति रही। सभा में उपस्थित सभी लोगों ने आतंकवाद की निंदा करते हुए एक स्वर में कहा कि इस तरह के कायराना हमले देश की आत्मा को नहीं डिगा सकते। शहीदों की शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी।

कश्मीर का काला सच: तब भी जैसे थे हालात, आज भी वैसे ही

कश्मीर का काला सच: तब भी जैसे थे हालात, आज भी वैसे ही खास रिपोर्ट | खबरी भैया टीम श्रीनगर/नई दिल्ली | 23 अप्रैल 2025 कश्मीर — एक ऐसा नाम जो सुनते ही खूबसूरत वादियों की तस्वीरें आंखों के सामने उभर आती हैं, लेकिन इन वादियों के पीछे छिपा है एक ऐसा सच जिसे अक्सर नजरअंदाज़ कर दिया जाता है। दशकों से राजनीतिक अस्थिरता, अलगाववाद, आतंकवाद और पीड़ित आम जनता की कहानियों ने इस क्षेत्र को दुनिया की सबसे संवेदनशील जगहों में शामिल कर दिया है। विकास की कोशिशें — ज़मीन पर कितना असर? सरकार ने बीते कुछ वर्षों में कश्मीर को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए तमाम योजनाएं शुरू की हैं। सड़कें बनीं, स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट्स शुरू हुए, निवेश के दरवाज़े खुले, लेकिन सवाल यही है कि क्या ये सब शांति की गारंटी दे सकते हैं? अनुच्छेद 370 हटने के बाद क्या बदला? 5 अगस्त 2019 को जब जम्मू-कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा हटाया गया, तो सरकार ने दावा किया था कि यह ऐतिहासिक फैसला कश्मीर को विकास की नई राह पर ले जाएगा। शुरुआत में वहां संचार सेवाओं को बंद कर दिया गया, नेताओं को नजरबंद किया गया और लोगों को रोज़मर्रा की ज़िंदग...

सांप नहीं, साज़िश थी ये मौत: मेरठ में पत्नी ने प्रेमी संग रची ऐसी चाल, जिसे सुनकर रूह कांप जाए— By खबरी भैया

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   मेरठ की एक सुबह आम तो थी, लेकिन एक घर की चारदीवारी में वो खेल चल रहा था, जिसकी पटकथा रात को ही लिखी जा चुकी थी। जिस घर में सुबह चाय की महक फैलनी चाहिए थी, वहां मातम पसरा था। एक युवक की लाश पलंग पर पड़ी थी… हाथ के नीचे एक जिंदा सांप फुंकार मार रहा था… और शरीर पर जगह-जगह सर्पदंश के निशान। परिजन समझे—सांप ने डस लिया होगा। किस्मत खराब थी, जो सोते-सोते मौत आई। लेकिन पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने जो राज खोला, उसने सबका ज़मीर हिला दिया। रिपोर्ट कहती है—युवक की मौत दम घुटने से हुई है। यानी उसकी सांसें छीनी गई थीं, ज़हर से नहीं… बल्कि इंसानी साज़िश से। और जब पुलिस ने पत्नी से कड़ाई से सवाल किए, तो हकीकत किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं निकली। महिला ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर पहले पति का गला घोंटा… फिर उसकी लाश के नीचे एक ज़िंदा सांप दबा दिया। उम्मीद थी कि जब लाश मिलेगी, तो सांप को दोषी ठहराया जाएगा… और वो दोनों बच जाएंगे। और प्लान लगभग काम कर ही गया था, अगर पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने पोल न खोल दी होती। अब दोनों आरोपी सलाखों के पीछे हैं। लेकिन सवाल ये है—क्या किसी के दिल मे...

वक्फ संशोधन अधिनियम के विरोध की आड़ में पश्चिम बंगाल जल उठा

वक्फ संशोधन अधिनियम के विरोध की आड़ में पश्चिम बंगाल जल उठा पश्चिम बंगाल के कई जिलों में वक्फ संशोधन अधिनियम के विरोध के नाम पर हिंसा और उत्पात की घटनाएं सामने आई हैं। सबसे गंभीर स्थिति मुर्शिदाबाद जिले की बताई जा रही है, जहां हिंसक भीड़ ने एक पिता-पुत्र की निर्मम हत्या कर दी। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे कई वीडियो में देखा जा सकता है कि झंडे लहराती भीड़ दुकानों में लूटपाट और आगजनी कर रही है। प्रशासन ने कई इलाकों में इंटरनेट सेवा बंद कर दी है और भारी संख्या में सुरक्षाबलों की तैनाती की गई है। राज्य पहले से ही बांग्लादेश से हो रही अवैध घुसपैठ के कारण जनसंख्या संरचना में बदलाव जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। अब, बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद वहां इस्लामिक कट्टरपंथियों और ISI नेटवर्क के बढ़ते प्रभाव का असर भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों, विशेषकर पश्चिम बंगाल पर भी दिखने लगा है। स्थिति केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरी और सुनियोजित साजिश की आशंका भी जताई जा रही है। केंद्र और राज्य सरकारों के लिए यह समय सजग और सतर्क रहने का है।

"खबरी भैया" आगरा वाला ‘डिलीवरी घोटाला’

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भैया, अब सुनिए यूपी के आगरा से आई ऐसी ख़बर जो सुनके डॉक्टर भी माथा पकड़ लें, और सरकार भी शरमा जाए! मंच सज चुका है: लोकेशन — फतेहाबाद CHC, आगरा अब कहानी में एंट्री होती है एक महिला की, जिनके नाम पर सरकारी कागजों में... ढाई साल में 25 बार बच्चा जनने की इंट्री मिलती है। हां भई, 25 डिलीवरी! और तो और, 5 बार नसबंदी भी करवा ली — एक ही महिला ने! अब सवाल उठता है — "भाभीजी, ये करिश्मा कैसे हुआ?" तो जवाब मिलता है — "मौसम नहीं सिस्टम बदला है!" असल में ये कोई चमत्कार नहीं, ये है सरकारी रिकॉर्ड का बड़ा फर्जीवाड़ा! जननी सुरक्षा योजना और नसबंदी प्रोत्साहन योजना में घोटाला कर डाला — 45,000 रुपये की ठगी , एक महिला के नाम पर! डॉक्टर-आशा बहुएं मिलकर सरकार की आंख में धूल झोंक रहे थे, और खाते में घुसा रहे थे पैसे — भाभीजी को बिना बताए! अब CMO साहब (डॉ. अरुण श्रीवास्तव) ने केस पकड़ा है और जांच बिठा दी है — "ये तकनीकी गलती है या जानबूझकर किया गया खेल? दोषी मिला तो छुट्टी तय है!" खबरी भैया का तंज़: "सिस्टम ऐसा चला कि भाभीजी को भी पता नहीं चला — कब...

"मैं क्या कर सकती हूं, तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं" — एक आत्महत्या के पीछे की कहानी

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"तुम क्या चाहती हो, आत्महत्या कर लूं? तुमसे तो ये भी नहीं होगा..." यह संवाद किसी फिल्म का हिस्सा नहीं, बल्कि एक सच्चाई है। यह बातचीत लखनऊ में एक रिटायर्ड दरोगा के बेटे मंगल और उसकी पत्नी अनुराधा के बीच हुई थी। यह आवाज़ मंगल के मोबाइल में रिकॉर्ड थी—एक ऐसी रिकॉर्डिंग जो उसकी मौत के बाद सामने आई। मंगल ने 3 अप्रैल को घर में ज़हर खा लिया। परिवार ने उसे आनन-फानन में ट्रॉमा सेंटर पहुंचाया, लेकिन उसकी जान नहीं बच सकी। यह सिर्फ एक आत्महत्या नहीं थी, यह एक रिश्ते की टूटन, परिवार की जकड़न और मानसिक तनाव की परतों को उजागर करती है। मंगल और अनुराधा का रिश्ता दो साल के अफेयर के बाद 13 दिसंबर 2021 को शादी में बदला था। लेकिन शायद शादी से पहले जो प्रेम था, वह शादी के बाद जिम्मेदारियों और अपेक्षाओं के बोझ तले दबता गया। बातचीत में अनुराधा साफ तौर पर कह रही है कि "अगर परिवार से अलग नहीं हुए तो तुम्हें अंदाज़ा नहीं होगा कि मैं क्या कर सकती हूं..." यह सिर्फ गुस्से में कही बात नहीं लगती, बल्कि एक लंबे समय से पल रहे असंतोष का नतीजा है। इस घटना से कई सवाल उठते हैं: क्या मंगल घरेलू प...

ट्रंप बोले– मानोगे नहीं तो टैक्स की मार पड़ेगी! चीन बोला– हम भी आखिरी दम तक लड़ेंगे!

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— खबरी भैया की खास रिपोर्ट दुनिया के दो सबसे बड़े देश फिर आमने-सामने हैं। मामला है टैरिफ यानी व्यापार पर टैक्स का। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने धमकी दे दी है – अगर चीन ने 34% टैक्स वापस नहीं लिया, तो बुधवार से उस पर 50% एक्स्ट्रा टैरिफ लगेगा! अब चीन कोई शांत बैठने वाला मुल्क तो है नहीं। उसने झट से जवाब दिया – “अमेरिका ब्लैकमेलिंग कर रहा है। ये गलती पर गलती कर रहे हैं। अगर लड़ाई चाहिए, तो हम भी पीछे हटने वाले नहीं हैं।” अब मसला इतना बड़ा क्यों हो गया? अमेरिका चाहता है कि चीन अपने सामान पर लगने वाला टैक्स कम करे, ताकि अमेरिकी कंपनियों को नुकसान न हो। चीन कह रहा है – “हमारे साथ जबरदस्ती नहीं चलेगी।” दोनों सुपरपावर अब एक बार फिर ट्रेड वॉर की कगार पर खड़े हैं। तो नुकसान किसका होगा? सबसे पहले आम जनता का – दोनों देशों में सामान महंगा होगा। फिर बाकी देशों का – जैसे भारत, जिनका व्यापार दोनों से है। और फिर पूरी दुनिया का – क्योंकि जब हाथी लड़ते हैं, तो घास को ही नुकसान होता है। खबरी भैया की राय: भाई लोग, ये सिर्फ टैक्स का नहीं, टशन का मामला है। अमेरि...

स्कूल नहीं, दुकान हैं ये!

एक ज़माना था जब स्कूलों को शिक्षा का मंदिर कहा जाता था। लेकिन आज हालात ये हैं कि ये मंदिर अब व्यापारिक प्रतिष्ठान बन चुके हैं—और वो भी ऐसे, जो अभिभावकों की जेब पर सीधा हमला कर रहे हैं। किताबों का बाजारीकरण आज निजी स्कूलों में शिक्षा से ज़्यादा किताबों का बाजारीकरण हो रहा है। निजी स्कूलों ने अब किताबों को भी मुनाफे का ज़रिया बना लिया है। हर स्कूल अपनी खास किताबें तय करता है, और फिर अभिभावकों को मजबूर किया जाता है कि वे इन्हें स्कूल के बताए गए दुकानों से ही खरीदें। सरकारी मान्यता प्राप्त एनसीईआरटी की किताबें किनारे कर दी जाती हैं और उनकी जगह महंगी पब्लिकेशन की किताबें थोपी जाती हैं। यूनिफॉर्म और जूते का ठेका केवल किताबें ही नहीं, यूनिफॉर्म, बैग, जूते—सब स्कूल के “चयनित दुकानदार” से खरीदने की मजबूरी होती है। अगर आप बाहर से लेने की सोचें तो स्कूल के नियमों की तलवार लटकाई जाती है। आखिर क्यों? क्या अभिभावकों को अपनी पसंद से सस्ता और अच्छा विकल्प चुनने का हक नहीं? फीस का फंडा फीस के नाम पर एक अलग ही गाथा है। ट्यूशन फीस के अलावा बच्चों से “डेवलपमेंट फीस”, “एक्टिविटी फीस”, “स्मार्ट क्लास फीस” ज...

मोरों की चीखें, हिरणों की लाशें: जब जंगल ने तिल-तिल कर मरना शुरू किया

मोरों की चीखें, हिरणों की लाशें: जब जंगल ने तिल-तिल कर मरना शुरू किया हैदराबाद यूनिवर्सिटी के नजदीक फैले 400 एकड़ घने जंगल को विकास की बुलडोज़र निगल रही है। ये वही जंगल हैं जहां कभी सुबह की पहली किरण के साथ मोरों की आवाज़ गूंजती थी। जहां हिरणों की टोली खुले मैदानों में उछलती, जहां बेजुबान जानवरों को कोई डर नहीं था। अब वहीं पसरा है सन्नाटा। हर रोज़ दर्जनों पेड़ गिर रहे हैं, और उनके साथ गिर रही है एक-एक उम्मीद। आईटी पार्क बन रहा है, बहुमंज़िला इमारतें खड़ी की जाएंगी, और उसके नाम पर जो हो रहा है, उसे कोई "सौंदर्यीकरण" कहता है तो कोई "विकास"। मगर इस विकास की चकाचौंध के पीछे वो स्याही कौन देखेगा जो मासूम जीवों के खून से लिखी जा रही है? जानवरों का पलायन नहीं, नरसंहार हो रहा है बीते कुछ हफ्तों में स्थानीय लोगों ने दर्जनों मरे हुए हिरणों और घायल पक्षियों को देखा है। मशीनों की आवाज़ से डरे हुए जानवर गांवों की तरफ भाग रहे हैं—कभी किसी खेत में दिखते हैं, कभी सड़क किनारे। कुछ तो रास्ता भटक कर गाड़ियों की चपेट में आकर दम तोड़ चुके हैं। और मोर? जो भारत का राष्ट्रीय पक्षी है...

दिल्ली में EWS अभ्यर्थियों का आंदोलन: 5 एकड़ भूमि सीमा का अन्याय

दिल्ली में EWS अभ्यर्थियों का आंदोलन: 5 एकड़ भूमि सीमा का अन्याय दिल्ली में आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग (EWS) के अभ्यर्थियों द्वारा चल रहा आंदोलन न्याय और समानता की लड़ाई का प्रतीक बन गया है। इस आंदोलन का मुख्य मुद्दा सरकार द्वारा निर्धारित 5 एकड़ भूमि की सीमा है, जिसने कई गरीब किसानों के बच्चों को आरक्षण के लाभ से बाहर कर दिया है। यह नियम न केवल अनुचित है, बल्कि सरकार की किसान विरोधी मानसिकता को भी उजागर करता है। 5 एकड़ भूमि की शर्त: न्याय या अन्याय? सरकार ने EWS कोटा का लाभ देने के लिए यह शर्त रखी है कि अभ्यर्थी या उसके परिवार के पास 5 एकड़ से अधिक भूमि नहीं होनी चाहिए। पहली नज़र में यह नियम सही लग सकता है, लेकिन जमीनी सच्चाई कुछ और ही है। भूमि का क्षेत्रफल नहीं, आय मायने रखती है: कई राज्यों में किसानों के पास 5 एकड़ से अधिक भूमि हो सकती है, लेकिन उनकी वार्षिक आय बेहद कम होती है। सिर्फ भूमि के आधार पर उन्हें संपन्न मान लेना गलत है। भू-स्वामित्व और आर्थिक स्थिति अलग-अलग चीजें हैं: कई परिवारों के पास नाममात्र की भूमि होती है, जो असिंचित या बंजर हो सकती है। केवल कागजी आंकड़ों स...

"बदलते लोग या बदलती हमारी सोच?"

  अक्सर हम बदलाव को सिर्फ बाहरी नजरिए से देखते हैं, लेकिन यह समझना जरूरी होता है कि क्या बदलाव वास्तव में सामने वाले में हो रहा है या हमारी अपनी सोच और नजरिए में? अगर हमें लगता है कि कोई व्यक्ति बदल रहा है, तो यह जरूरी है कि हम आत्मचिंतन करें—क्या हमारी अपेक्षाएँ बदल गई हैं? क्या परिस्थितियाँ अलग हो गई हैं? या फिर हम ही कुछ नया अनुभव कर रहे हैं जिससे हमें यह बदलाव महसूस हो रहा है? कभी-कभी बदलाव स्वाभाविक होता है, समय के साथ लोग अनुभवों से सीखते हैं और उनका व्यवहार भी बदलता है। लेकिन अगर किसी खास वजह से बदलाव आ रहा है—जैसे किसी रिश्ते में दूरी, कोई मानसिक तनाव, या बाहरी दबाव—तो उसे समझने की कोशिश करनी चाहिए। सबसे अहम बात यह है कि हम खुद को भी परखें। क्या हमारा रवैया, सोच या व्यवहार किसी बदलाव की वजह बन रहे हैं? अगर हां, तो हमें खुद को भी देखने और सुधारने की जरूरत हो सकती है।

जौनपुर की राजनीति: इतिहास, वर्तमान और भविष्य

 परिचय उत्तर प्रदेश का जौनपुर जिला अपनी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक धरोहर के लिए जाना जाता है। यह क्षेत्र न केवल शिक्षा और साहित्य में समृद्ध है, बल्कि इसकी राजनीतिक चेतना भी गहरी रही है। जौनपुर की राजनीति में जातीय समीकरण, क्षेत्रीय दबदबा और राष्ट्रीय दलों का प्रभाव गहराई से देखने को मिलता है। इस लेख में हम जौनपुर की राजनीतिक यात्रा, वर्तमान परिदृश्य और भविष्य की संभावनाओं पर चर्चा करेंगे। --- जौनपुर की राजनीतिक पृष्ठभूमि भारत की आज़ादी के बाद से जौनपुर की राजनीति में कई उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं। कांग्रेस का शुरुआती दबदबा, फिर समाजवादी और बहुजन राजनीति का उदय, और वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की मजबूती – इन सभी ने जौनपुर की राजनीतिक तस्वीर को प्रभावित किया है। 1950 और 1960 के दशक में कांग्रेस का दबदबा था, लेकिन 1980 के दशक में जनता दल और समाजवादी पार्टी ने यहां अपनी पकड़ बनाई। 1990 के दशक के बाद से भाजपा, सपा और बसपा ने यहां प्रमुख दलों के रूप में अपनी स्थिति बनाई। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य 1. प्रमुख राजनीतिक दल और उनके प्रभाव भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) – 2014 और...