जिंदगी: खुली किताब या पेचीदा पहेली?
'खबरी भैया'
अरे भैया, बात सीधी सी है – जिंदगी दिखती तो है जैसे खुली किताब हो, लेकिन जब पढ़ने बैठो न, तो समझ में आता है कि ये किताब नहीं, रहस्य उपन्यास है!
कभी-कभी तो लगता है सब कुछ सेट है – टाइम पे उठो, काम पे जाओ, शाम को चाय पियो और रात को चैन की नींद सो जाओ। लेकिन जनाब, ये जिंदगी है, Netflix की वेब सीरीज़ नहीं, जो स्क्रिप्ट के हिसाब से चले! अगले ही पल कुछ ऐसा हो जाता है कि जो सीधा-सपाट रास्ता था, वो मुरझाए हुए नक्शे की तरह उलझ जाता है।
एकदम आम सी लगने वाली ज़िंदगी कब गले में पड़ने वाली गांठ बन जाए, पता ही नहीं चलता। एक दिन हंसी-ठिठोली, दूसरे दिन टेंशन का तूफ़ान। और इन सबसे ऊपर – 'अब आगे क्या?' वाला सवाल हमेशा सिर पर बैठा रहता है।
लेकिन यही तो असली मजा है भैया!
अगर सब कुछ पहले से पता चल जाए तो जिंदगी में रोमांच कहां बचेगा?
जो पल जैसे आए, उसे वैसे ही जीने का नाम ही तो असली 'ज़िंदगी' है।
तो बस चलिए, जिंदगी की इस खुली-बंद किताब को हर रोज़ के नए पन्ने की तरह पढ़ते रहिए। कभी मुस्कराकर, कभी आंसू बहाकर – लेकिन रुकिए मत, क्योंकि 'खेल अभी बाकी है मेरे दोस्त'।
✍️ लिखा गया दिल से,
आपके अपने – खबरी भैया द्वारा!
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