लोलार्क कुण्ड स्नान : आस्था और विश्वास की जीवंत तस्वीर

वाराणसी केवल एक शहर नहीं, बल्कि विश्वास और धर्म की धड़कन है। यहाँ हर घाट, हर मंदिर, हर कुण्ड एक अनोखी परंपरा और आस्था को अपने भीतर समेटे हुए है। इन्हीं में से एक है लोलार्क कुण्ड, जहाँ स्नान करने के लिए लाखों श्रद्धालु देशभर से उमड़ते हैं। कहा जाता है कि यहाँ स्नान करने से संतान-सुख की प्राप्ति होती है।

अस्सी घाट से लोलार्क कुण्ड की ओर

कल रात करीब 9:30 बजे हम अस्सी घाट पहुँचे। वहाँ से 10 बजे लोलार्क कुण्ड स्नान के लिए लगी लाइन में शामिल हो गए। भीड़ इतनी अधिक थी कि अंदाज़ा लगाना मुश्किल था कि मंज़िल तक पहुँचने में कितना समय लगेगा। कोई कह रहा था 1 किलोमीटर, तो कोई 2 किलोमीटर लंबी लाइन।

रात 10 बजे से सुबह 5 बजे तक हम सिर्फ 500 मीटर ही आगे बढ़ पाए। सोचिए, 8 घंटे में मुश्किल से 700 मीटर की दूरी! लेकिन भीड़ में किसी ने हार नहीं मानी। सभी धैर्यपूर्वक खड़े थे क्योंकि सबके मन में केवल एक ही जवाब था – “स्नान करना है।”

आस्था का महासंगम

तीन-तीन लाइनें बनी हुई थीं और सभी खचाखच भरी थीं। विवाहित जोड़े, बुज़ुर्ग महिलाएँ-पुरुष, युवा और बच्चे – सभी अपने संकल्पों और इच्छाओं के साथ आगे बढ़ रहे थे। सबसे अधिक संख्या उन जोड़ों की थी, जो संतान प्राप्ति की कामना लेकर आए थे।

देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग यहाँ पहुँचे थे – कोलकाता, बहराइच, इंदौर और न जाने कहाँ-कहाँ से। वाराणसी और आसपास के जिलों से तो श्रद्धालुओं का मानो सैलाब उमड़ा हुआ था।

भीड़ की थकान और धक्का-मुक्की के बीच भी सबसे प्रेरक बात यही थी कि हर किसी के होंठों पर एक ही वाक्य था –
“अब जब यहाँ तक आ ही गए हैं, तो स्नान करके ही लौटेंगे।”

सुबह का स्नान और दिव्यता का अनुभव

आख़िरकार सुबह 8 बजे हमारा नंबर आया। जैसे ही हमने लोलार्क कुण्ड में स्नान किया, मन और शरीर दोनों ही तृप्त हो गए। घंटों की थकान पलभर में मिट गई। स्नान के बाद हमने लोधेश्वर महादेव का दर्शन किया और वहाँ आशीर्वाद प्राप्त कर घर की ओर प्रस्थान किया।

लेकिन जाते-जाते जब पीछे मुड़कर देखा, तो वह दृश्य किसी मानव-समुद्र से कम नहीं था। लहरों की तरह उमड़ती भीड़, जिनके चेहरे पर थकान तो थी लेकिन आँखों में आस्था और विश्वास की चमक भी।

 कुण्ड का यह अनुभव केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था। यह धैर्य, आस्था और विश्वास की ऐसी जीवंत तस्वीर थी, जिसने यह साबित कर दिया कि जब मन में श्रद्धा हो, तो 10–15 घंटे की प्रतीक्षा भी छोटी लगती है।

वाराणसी की इस अद्भुत परंपरा को देखकर मन यही कहता है –
"सच्ची आस्था वही है, जो कठिनाइयों के बावजूद मनुष्य को डगमगाने न दे।"


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

वनटांगिया मजदूरों के बीच मनाई जाने वाली योगी आदित्यनाथ जी की दीपावली

RTI से बड़ा खुलासा! केदारनाथ-बदरीनाथ के चढ़ावे के पैसे से VIP मेहमाननवाजी?