मोरों की चीखें, हिरणों की लाशें: जब जंगल ने तिल-तिल कर मरना शुरू किया
मोरों की चीखें, हिरणों की लाशें: जब जंगल ने तिल-तिल कर मरना शुरू किया
हैदराबाद यूनिवर्सिटी के नजदीक फैले 400 एकड़ घने जंगल को विकास की बुलडोज़र निगल रही है। ये वही जंगल हैं जहां कभी सुबह की पहली किरण के साथ मोरों की आवाज़ गूंजती थी। जहां हिरणों की टोली खुले मैदानों में उछलती, जहां बेजुबान जानवरों को कोई डर नहीं था। अब वहीं पसरा है सन्नाटा। हर रोज़ दर्जनों पेड़ गिर रहे हैं, और उनके साथ गिर रही है एक-एक उम्मीद।
आईटी पार्क बन रहा है, बहुमंज़िला इमारतें खड़ी की जाएंगी, और उसके नाम पर जो हो रहा है, उसे कोई "सौंदर्यीकरण" कहता है तो कोई "विकास"। मगर इस विकास की चकाचौंध के पीछे वो स्याही कौन देखेगा जो मासूम जीवों के खून से लिखी जा रही है?
जानवरों का पलायन नहीं, नरसंहार हो रहा है
बीते कुछ हफ्तों में स्थानीय लोगों ने दर्जनों मरे हुए हिरणों और घायल पक्षियों को देखा है। मशीनों की आवाज़ से डरे हुए जानवर गांवों की तरफ भाग रहे हैं—कभी किसी खेत में दिखते हैं, कभी सड़क किनारे। कुछ तो रास्ता भटक कर गाड़ियों की चपेट में आकर दम तोड़ चुके हैं। और मोर? जो भारत का राष्ट्रीय पक्षी है, उनकी चीखें भी अब इन्सानी कानों तक नहीं पहुंचतीं। क्या हम इतने बहरे हो गए हैं?
‘ग्रीन एक्टिविज़्म’ की मौन परेड
होली पर ‘इको-फ्रेंडली रंगों’ की वकालत करने वाले, दीवाली पर ‘ध्वनि प्रदूषण’ की चिंता जताने वाले कथित पर्यावरण एक्टिविस्ट इस जंगल विनाश पर मौन क्यों हैं? क्या जंगलों का दर्द त्योहारों जितना ट्रेंडिंग मुद्दा नहीं है? या फिर सोशल मीडिया पर वायरल होने लायक तस्वीरें नहीं मिल रही?
सवाल वही है—क्या विकास के लिए विनाश अनिवार्य है?
विकास ज़रूरी है, लेकिन बर्बादी नहीं। इस देश में जब भी किसी जंगल पर बुलडोज़र चला है, उससे केवल हरियाली नहीं, बल्कि जलवायु, जल स्रोत, मिट्टी की गुणवत्ता और जैव विविधता भी खोई है। और ये क्षति कभी पूरी नहीं हो सकी है।
हम जिन शहरों को स्मार्ट बना रहे हैं, अगर उन शहरों में सांस लेने लायक हवा और देखने लायक हरियाली नहीं बचेगी, तो क्या वो वाकई स्मार्ट होंगे?
यह सिर्फ एक जंगल की कहानी नहीं है, यह एक पूरे युग के खत्म होने की शुरुआत है।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें