जातीय राजनीति की चिंगारी और भाजपा की किरकिरी


वाराणसी, छितौना गांव की घटना ने एक बार फिर दिखा दिया है कि सत्ता की भूख और जातीय समीकरण जब मिलते हैं, तो कानून-व्यवस्था धूल में मिल जाती है। खेत में जानवर घुसने से शुरू हुआ मामूली विवाद कैसे एक बड़े जातीय संघर्ष में बदल गया, इसका ताजा उदाहरण वाराणसी में सामने आया है।

भाजपा ने ओमप्रकाश राजभर के विकल्प के रूप में अनिल राजभर को मंत्री बनाकर जो "राजनीतिक संतुलन" साधने की कोशिश की थी, वही अब उसके गले की हड्डी बनता नजर आ रहा है। मंत्री अनिल राजभर ने इस मामले में जिस तरह हस्तक्षेप कर अपने स्वजातीय पक्ष पर कार्रवाई रुकवाई और भाजपा के ही बूथ अध्यक्ष संजय सिंह पर एफआईआर दर्ज करवाई, उसने सत्ता की हकीकत को उजागर कर दिया।

मामला यहीं नहीं थमा। वीडियो में मंत्री के बेटे अरविंद राजभर के समर्थक जिस तरह गाली-गलौज और समुदाय विशेष के खिलाफ जहर उगलते नजर आए, उसने आग में घी का काम किया। इतने गंभीर वीडियो सामने आने के बाद भी प्रशासन की चुप्पी न केवल संदिग्ध है, बल्कि यह दर्शाती है कि पुलिस किस हद तक राजनीतिक दबाव में घुटनों के बल बैठ चुकी है।
इस पूरे घटनाक्रम में भाजपा और योगी सरकार की साख को जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई जल्द होती नजर नहीं आती। जिस छवि को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वर्षों की मेहनत से "सख्त प्रशासक" के रूप में गढ़ा था, उसे अनिल राजभर और उनके समर्थकों ने चंद दिनों में मटियामेट कर दिया।

आज सवाल भाजपा से भी बड़ा है। यह सवाल पूरे लोकतंत्र से है — क्या कानून सिर्फ कमजोरों और विपक्ष के लिए है? क्या सत्ता में बैठे लोग कानून से ऊपर हैं? और अगर ऐसा है, तो "सबका साथ, सबका विकास" का नारा महज जुमला बनकर ही रह जाएगा।

अगर पार्टी ऐसे ही "नगीने" चुनती रही, तो उसकी राजनीतिक क्षति की भरपाई कोई रणनीति या चुनावी गणित नहीं कर पाएगा। इस बार जो नुकसान हुआ है, वह सिर्फ छवि का नहीं, बल्कि जनता के भरोसे का है। और जब भरोसा टूटता है, तो सत्ता की नींव भी हिलने में देर नहीं लगती।
अगर पार्टी ऐसे ही "नगीने" चुनती रही, तो उसकी राजनीतिक क्षति की भरपाई कोई रणनीति या चुनावी गणित नहीं कर पाएगा। इस बार जो नुकसान हुआ है, वह सिर्फ छवि का नहीं, बल्कि जनता के भरोसे का है। और जब भरोसा टूटता है, तो सत्ता की नींव भी हिलने में देर नहीं लगती।

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