थाली और हथेली

✍️ खबरी भैया ऑफिसियल

स्टेशन की भीड़ अपने ही किनारे में डूबी हुई थी। किसी को घर पहुंचना था, किसी को काम पर जाना था। गर्मी थी, घटिया, और वक़्त की आपाधापी में इंसानियत कहीं कोने में थी।

सत्यनिष्ठ बीच, एक वृद्ध - झुकी हुई कमर, फटी कमीज़, और ढाँसी आँखों के साथ - मंच के किनारे धीरे-धीरे चल रहा था। उन्होंने कुछ नहीं बोला था, बस पॉलीथिल आगे कर देता है। भीख नहीं माँगता था - अपेक्षित माँगता था। इंसान से इंसानियत की एक झलक।

कुछ ने देखा, पर अनावरण किया।
कुछ ने मुँह फेर लिया।
किसी ने डाँटकर भाग दिया -
"चल हट, काम कर! हर किसी से पैसा माँगता है!"

बुजुर्ग बुजुर्ग आगे बढ़े। ना कुछ माँगा, ना कुछ कहा - बस अपनी गोलियों को और अंदर खींच लिया।

शाम को उसी शहर में एक मंदिर की घंटियों से गूंज रही थी। आरती का समय था. पुजारी ने थाली में दीप जलाया, कपूर ने रखा, और भगवान के सामने भक्ति के साथ थाली कुखाई।
आरती के बाद वही थाली समर्थकों की ओर से प्रकाशित हुई। लोग श्रद्धा से झुके, हाथ जोड़ा, और वह थाली में दान डाला - सिक्का, नोट, फूल... मन से भक्ति और थाली में उतर गए।

आदर्श पर वह वृद्ध व्यक्ति था। उसने देखा - वही थाली जो सुबह प्लास्टिक की थीली जैसी थी - अब सम्मान पा रही थी। क्योंकि वो किसी पत्थर के सामने था।

उसकी मंजिलें कुछ देर तक बंद रहीं, और फिर बहुत-बहुत चर्च से खुलीं। उसने मन में कहा -

"काश में भी पत्थर होता है...
तो मेरी पथरी भी एक दिन थाली बन जाती है।"

रात गहरी होने लगी। मंदिर का दरवाजा बंद हो गया।
आरती की थाली अंदर चली गई।
बाहर एक पेंसिल अब भी खाली थी -
लेकिन इस बार कप नहीं रहा था।

 यह कथा किसी भगवान, धर्म या आस्था की तुलना नहीं करती।

ये बस एक आम इंसान की सोच है, जो जीवन की भीड़-भाड़ और आरामगाहों में कभी-कभी ऐसी ही प्रक्रियाओं में बह जाती है।

यह श्रद्धा पर सवाल नहीं, बल्कि संवेदना की कॉल है।

✍️ लेखक: खबरी भैया ऑफिशल 

📌 इंसान के आईने से झांकती एक छोटी सी सच्चाई
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