स्कूल नहीं, दुकान हैं ये!

एक ज़माना था जब स्कूलों को शिक्षा का मंदिर कहा जाता था। लेकिन आज हालात ये हैं कि ये मंदिर अब व्यापारिक प्रतिष्ठान बन चुके हैं—और वो भी ऐसे, जो अभिभावकों की जेब पर सीधा हमला कर रहे हैं।

किताबों का बाजारीकरण

आज निजी स्कूलों में शिक्षा से ज़्यादा किताबों का बाजारीकरण हो रहा है। निजी स्कूलों ने अब किताबों को भी मुनाफे का ज़रिया बना लिया है। हर स्कूल अपनी खास किताबें तय करता है, और फिर अभिभावकों को मजबूर किया जाता है कि वे इन्हें स्कूल के बताए गए दुकानों से ही खरीदें। सरकारी मान्यता प्राप्त एनसीईआरटी की किताबें किनारे कर दी जाती हैं और उनकी जगह महंगी पब्लिकेशन की किताबें थोपी जाती हैं।


यूनिफॉर्म और जूते का ठेका

केवल किताबें ही नहीं, यूनिफॉर्म, बैग, जूते—सब स्कूल के “चयनित दुकानदार” से खरीदने की मजबूरी होती है। अगर आप बाहर से लेने की सोचें तो स्कूल के नियमों की तलवार लटकाई जाती है। आखिर क्यों? क्या अभिभावकों को अपनी पसंद से सस्ता और अच्छा विकल्प चुनने का हक नहीं?


फीस का फंडा

फीस के नाम पर एक अलग ही गाथा है। ट्यूशन फीस के अलावा बच्चों से “डेवलपमेंट फीस”, “एक्टिविटी फीस”, “स्मार्ट क्लास फीस” जैसी अजीबो-गरीब मदों में पैसे वसूले जाते हैं। न तो कोई हिसाब दिया जाता है, न कोई पारदर्शिता होती है। कुछ स्कूल तो सालभर की फीस एकमुश्त जमा कराने की शर्त रखते हैं।

प्रशासन की चुप्पी

सरकार और प्रशासन इन सब पर आंख मूंदे बैठा है। शिक्षा विभाग की गाइडलाइन्स केवल कागजों तक सीमित हैं। अभिभावकों की सुनवाई कहीं नहीं है। शिकायत करो तो या तो कार्रवाई नहीं होती, या फिर मामले को दबा दिया जाता है।

समाप्ति नहीं, शुरुआत चाहिए

शिक्षा का ये बाज़ारीकरण बंद होना चाहिए। ज़रूरत है कि अभिभावक एकजुट हों, आवाज़ उठाएं और प्रशासन को जवाबदेह बनाएं। बच्चों के भविष्य के नाम पर जो धंधा चल रहा है, उसे रोकना अब जरूरी हो गया है।

क्योंकि बात सिर्फ फीस की नहीं है, अब बात बच्चों के भविष्य की है।

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